भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद
केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान

HomeLATEST RESEARCH FINDINGS

समुद्री केकडों के पालन योग्य हीमोलिम्फ माइक्रोबयोटा की ओर झलक : जलीय प्रोबयोटिक्स / जीवाणुरोधी एजेंटों के लिए अप्रयुक्त संसाधन

टिकाऊ जलकृषि उत्पादन में होने वाली प्राथमिक समस्या जीवाणु रोग के रूप में निकले गए है, जहां मछली एवं कवचमछली रोगाणुओं को रोकने के लिए प्रोबयोटिक्स महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. चूंकि वाणिज्यिक उत्पादों की अपेक्षा स्वयंसिद्ध तैयारी अधिक प्रभावी होंगी, जलीय पर्यावरण में नए जीवाणुरोधी उपभेदों की खोज जलीय रोगाणुओं के लिए चेतावनी है. आगे, स्वास्थ्य की स्थिति एवं रोग निदान के लिए हीमोलिम्फ माइक्रोब्स की प्रचुरता, बनावट एवं भूमिका को जानना ज़रूरी है. अतः वर्तमान अध्ययन में जलकृषि के लिए उपयोग किए जानेवाले 4 प्रमुख समुद्री केकड़ों में पालन किए गए हेमोलिम्फ माइक्रोब्स की प्रधानता को उजागर करने के लिए उपयोग किया है. जीवाणुओं की प्रचुरता वैयक्तिक एवं प्रजातियों पर आश्रित है और मीडिया एवं प्रचुरता के बीच सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण आपसी प्रभाव था. हीमोलिम्फ माइक्रोब्स में 84% ग्राम नेगटीव वियोजक थे. सभी प्रजातियों का मुख्य वंश विब्रियो था जो प्रत्येक हीमोलिम्फ माइक्रो बयोटा (प्रचुरता एवं विविधता – दोनों के सन्दर्भ में) का वहन करता है. वर्तमान अध्ययन क्रस्टेशियन हीमोलिम्फ के वंश जैसे कि एंटेरो विब्रियो, पांटिया, क्लूवेरा एवं एंटरोबाक्टर पर प्रथम रिपोर्ट है. नई विब्रियो प्रजातियां भी पायी गयीं. आगे यह अध्ययन जलीय रोगाणु के विरुद्ध समुद्री केकड़ा हीमोलिम्फ माइक्रोब की निरोधात्मक गतिविधि पर प्रथम निरीक्षण है. यह अध्ययन जलीय रोगाणुओं से लड़ने के लिए प्रोबयोटिक्स / जीवाणुरोधी एजेन्टों के लिए अप्रयुक्त संसाधन के रूप में समुद्री केकड़ा हीमोलिम्फ माइक्रोब एक आशाजनक परिणाम प्रस्तुत करता है. साथ-साथ जलकृषि के लिए शक्यता युक्त 4 समुद्री केकड़ा प्रजातियों के स्वास्थ्य और रोग निदान को अनुमानित करने के लिए मंच प्रदान करता है.

भारत के दक्षिण–पश्चिम तट के पांबन तेरकुवडी में आनाय अवतरण की पखमछली विविधता

वर्तमान अनुसंधान पांबन तेरकुडी में आनाय द्वारा अवतरण की गयी मछलियों के सितंबर 2007 से अप्रैल 2012 तक किए गए पाक्षिक प्रतिचयनों के आधार पर प्राप्त वर्षवार वितरण प्रतिमानों की विस्तृत सूचना प्रदान करता है. 18 क्रमों के तहत 75 कुटुम्बों में आने वाली कुल 244 प्रजातियों का आकलन किया गया. परिमाणात्मक रूप से, कारल्ला डसुमेरी एवं लियोग्नातिड़े कुटुंब प्रमुख थे, कुटुंब करंजिडे में अधिकताम 20 प्रजातियों का योगदान देखा गया. वर्ष 2011-12 के दौरान मछलियों का अवतरण अधिकतम था, जब कि वर्ष 2008-09 के दौरान न्यूनतम अवतरण देखा गया. PRIMER 6 सॉफ्टवेयर के उपयोग से जैवविविधता अध्ययन किया गया. पारंपरिक विविधता के विविध सूचकांक एवं प्रबलता प्लाट, डेंड्रोग्राम एवं डेल्टा+ और लांबडा+ के फनल प्लोटों के आधार पर टैक्सोणमिक भिन्नता की प्रस्तुति एवं चर्चा की गयी.

समुद्री पिंजरों एवं इनडोर (indoor) टैंकों में पालन की गयी एशियन समुद्रीबास में बीटानोडा वाइरस संबंधी मृत्यु दर

भारत में एशियन समुद्रीबास का समुद्री पिंजरों में पालन एक प्रत्याशित जलकृषि गतिविधि है. भारत में समुद्री मछली पालन में बीटानोडावाइरस से प्रेरित मृत्यु दर की रिपोर्टें अधिक नहीं हैं. वर्तमान लेख में समुद्री पिंजरों एवं इनडोर टैंकों में पालन की गयी एशियन समुद्रीबास में वाइरल एनसेफालोपती एवं रेटिनोपती से संबंधित बीटानोडावाइरस के रेड स्पोटड ग्रूपर नर्वस नेक्रोसिस वाइरस (आर जी एन एन वी) जीनोटाइप के प्रकोप का विवरण किया गया है. टैंकों की तुलना में पिंजरों में मृत्यु दर कम थी. कोट प्रोटीन जीन का अनुक्रम विश्लेषण यह संकेत मिला कि वाइरस RGNNV जीनोटाइप से संबंधित था लेकिन रिपोर्ट किए गए अन्य RGNNV वियोजकों (isolates) से अलग है. वाइरस मछली कोशिका रेखाओ में साइटोपतिक (cytopathic) प्रभाव प्रेरित करने में सक्षम था. रोगाणु की लाइट माइक्रोस्कोपिक विशेषताओं का विवरण भी दिया गया।

गुजरात समुद्र के मेटापीनियस एफिनिस, जिंगा चिंगट की मात्स्यिकी, जीवसंख्या गतिकी एवं प्रभव स्थिति

गुजरात के वेरावल मछली अवतरण केंद्र से परिचालित वाणिज्यिक आनायकों से जनवरी 2012 से दिसंबर 2015 के दौरान प्रजातियों की लंबाई आवृत्ति, पकड़ एवं प्रयास डेटा को एकत्रित करके मेटापीनियस एफिनिस, जिंगा चिंगट के जीवन इतिहास के प्राचल एवं प्रभव की स्थिति का आकलन किया गया. नर के लिए विकास मापदंड जैसा कि L?, Kएवं  t0 क्रमशः 185.5मि. मी., 1.9मि. मी -0.001 मि. मी आकलित किया गया जब कि मादा मेटापीनियस एफिनिस के लिए 204.75 मि. मी, 1.7 मि. मी एवं  -0.001 मि. मी. आकलित किया गया. नर चिंगट की अपेक्षा मादाओं में अधिक वृद्धि पायी गयी. Z, M, एवं F जैसे मृत्यु दर मापदंड पुरुष में क्रमश: 8.37yr-1, 2.926yr-1, 5.45 yr-1 और मादा में क्रमश: 6.76yr-1,2.61yr-1 एवं 4.15yr-1 आकलित किया गया. मादा चिंगट की अपेक्षा नर में वर्तमान विदोहन अनुपात (Ecur) अधिक पाया गया. चिंगट में प्रग्रहण पर लंबाई (LM50) परिपक्वता पर  लंबाई (LC50) से अधिक पायी गयी. सापेक्ष उपज प्रति रिक्रूट (Y/R) प्रजातियों के लिए 0.75 ई – माक्स (E-max) अनुमानित किया गया है जो यह सूचित करता है कि उपज को अधिकतम बनाने के लिए वर्तमान विदोहन (Ecur) को बढ़ावा दिया जा सकता है. तोम्पसन और बेल बयो इकनोमिक मोडल यह सूचित करता है कि 5.2 एवं 3.8 गुना वर्तमान मत्स्यन स्तर बढ़ाने से क्रमश: पुरुष एवं मादा चिंगट के लिए अधिकतम उपज (MSY) बढ़ाया जा सकता है. यह बढ़ावा 12 से 15% तक किशोर प्रजनन प्रभव जैवमात्र (SSB0) का नाश किया जा सकता है जो प्रभव सुधार के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. प्रजातियों की अधिक लचीलापन प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, 25% के तुलनात्मक सुरक्षित स्तर पर जैवमात्रा को बनाए रखते हुए वर्तमान मत्स्यन दबाव (current fishing pressure) को 1.8 गुना बढ़ाया जा सकता है.

तमिलनाडु के पाक खाड़ी से अपूर्व पोरसेल्लानिड केकड़ा ज़्यूड़ोपोरसेल्लानेल्ला मनोलियेंसिस की पुनः खोज

पाक खाड़ी अवतरण के नेमी क्षेत्र सर्वेक्षण के दौरान ज़्यूड़ोपोरसेल्लानेल्ला मनोलियेंसिस की एकमात्र अंडवाही नमूना प्राप्त किया, जो 55 वर्ष के अंतराल के बाद भारतीय तटीय समुद्र से इस प्रजाति की पुन:प्राप्ति है. अंडवाही स्थिति में इन प्रजातियों की पुनः प्राप्ति से यह बात दृढ़ होती है कि वर्ष  1961 में शंकरनकुट्टी द्वारा दिए गए विवरण के बाद पारितंत्र में यह अब भी मौजूद है.

बेबीमोनिडे जठरपाद मोलस्क बेबीलोनिया स्पिरेटा से एंटी ओक्सिडेटीव एवं एंटी– लिपोक्सीजेनेस गतिविधियां सहित अप्रमाणित पोलीईथर माक्रोसैकलिक लाक्टोन

भारतीय प्रायद्वीप के दक्षिण पश्चिम तट से आकलित बेबीलोनिडे बेबीलोनिया स्पिरेटा के बयोअस्से निदर्शित इथैल असेटेट मेथनोल के क्रोमैटोग्राफिक विभाजन के परिणाम के रूप में पूर्व अप्रमाणित ढाँचा सहित 16- सदस्य पोलिईथर माक्रोसैकलिक लाक्टोन का वियोजन किया गया. विस्तृत स्पेक्ट्रल डेटा विश्लेषण के बाद यौगिक 10, 14-डै हाइड्रॉक्सी -4-(1?-प्रोपैल-1?(Z)-हेक्सेन-1?-yl)-7, 12- डाइओक्सापेंटाडेसानोलिडे के रूप में पहचाना गया. इन विट्रो मुक्त कण सफाई क्षमताओं (in vitro free radical scavenging capacities) के द्वारा एंटी आक्सीडंट गतिविधियों का मूल्यांकन करने पर यह रिपोर्ट की गयी कि पठित यौगिकों को वाणिज्यिक मानकों ब्यूटिलाटेहाइड्रोक्सी अनिसोल, ब्यूटिलेटड हाइड्रोक्सिल टोलीन एवं टोकोफेरोल (IC50 0.118–0.189?×?10?2?M) से अधिक गतिविधियां निहित हैं. नोन स्टेरोइड एन्टी इंफ्लमेटरी दवाएं आस्पिरिन (0.211?×?10?2?M) एवं इबुप्रोफेन (0.436?×?10?2?M) की अपेक्षा 5- लिपोक्सीजेनेस इन्हिबिशन अस्सय (5-lipoxygenase inhibition assay (0.073?×?10?2?M)) के लिए कम IC50 मूल्य के द्वारा इस यौगिक में अधिक एंटी– इंफ्लमेटरी क्षमता दिखायी दी. संरचना-गतिविधि के अध्ययनों से पता चलता है कि पोलिईथर मैक्रोसाइक्लिक लैक्टोन की जैवसक्रियता को इलेक्ट्रॉनिक और लिपोफिलिक वर्णकों द्वारा निर्देशित किया गया. वाणिज्यिक एंटीओक्सिडंट टोकोफेरोल (लोग पौ 9.98) की तुलना में पठित यौगिक के लिपोफिलिक पैरामीटर के ओक्टनोल – जल विभाजन गुणांक का मूल्य कम से कम 2.76 आकलित किया गया और वियोजक पोलीईथर माक्रोसैकलिक लाक्टोन की  एंटीओक्सिडंट विशेषताओं को निर्धारित करने के लिए प्राथमिक फिसिको केमिकल डिसक्रिप्टर की मान्यता दी गयी जब कि इलेक्ट्रोनिक पैरामीटर उनके एंटीइन्फ्लमेटरी गतिविधि को योगदान देते हुए दिखाया गया. एंटीओक्सिडेटीव और आंटी इन्फ्लामेटरी गतिविधि की क्षमता से युक्त डयोक्सीपेंटाडेसानोलिड़े ढाँचे में माक्रोसैकलिक लाक्टोन की उपस्थिति से संबंधित यह पहली रिपोर्ट है अतः कार्यात्मक भोजन और दवा अनुप्रयोगों में स्वाभाविक रूप से व्युत्पन्न एंटीऑक्सिडेंट और एंटीइन्फ्लमेटरी घटक के रूप में प्रत्याशित है।


Back to Top