भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद
केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान

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वेड्ज बैंक से स्टारी फ्लैयिंग गरनार्ड, डैक्टिलोप्टेना पेटेरसेनी की नयी उपस्थिति..

वेड्ज बैंक से स्टारी फ्लैयिंग गरनार्ड, डैक्टिलोप्टेना पेटेरसेनी की नयी उपस्थिति..

कन्याकुमारी तट के वेड्ज बैंक से 80-120 मी. गहराई से वाणिज्यिक आनायक मत्स्यन द्वारा पकडे गए 220.5-320.0 मि. मी. मानक लंबाई से युक्त डक्टाइलोप्टीना पीटेर्सनी के पांच नमूनों को भारत के दक्षिण पश्चिम तट के जेप्पियर मत्स्यन पोताश्रय, मुट्टम के अवतरण केंद्र से संग्रहित किया गया. इसके आकृतिपरक मापन एवं पहले पृष्ठ कंटक एवं पश्च कपाल के बीच दूसरे कंटक के अभाव जैसे मुख्य लक्षणों के आधार पर ये नमूने डक्टाइलोप्टीना पीटेर्सनी (नैस्ट्रोम, 1887) पहचाने गये. इन प्रजातियों की उपस्थिति से भारत के दक्षिण पश्चिम तट पर डी. पेटेरसेनी का व्यापक वितरण व्यक्त होता है. इस लेख में इसकी आकृतिपरक एवं शारीरिक विशेषताएं विस्तृत रूप से चर्चा की गयी है. सूत्रकणिका सैटोक्रोम ओक्सीडेस उप यूनिट जीन के आंशिक अनुक्रम के ज़रिए आण्विक पहचान करके इन प्रजातियों का प्रमाणीकरण किया गया है. 

एल्युतेरोनेमा टेट्राडक्टैलम में माइक्रो साटलाईट मार्कर का विकास एवं विधिमान्यकरण

एल्युतेरोनेमा टेट्राडक्टैलम में माइक्रो साटलाईट मार्कर का विकास एवं विधिमान्यकरण

चार अंगुलियों वाली पखमछली एल्युतेरोनेमा टेट्राडक्टैलम (शॉ, 1804) को भारत में समुद्री संवर्धन के लिए प्राथमिकता दी जाती है. वाणिज्यिक बाज़ार में इसकी मांग बढ़ती जा रही है. मात्स्यिकी प्रबंधन की दृष्टि में मछली प्रजातियों के आनुवंशिक प्रभव संरचना का विश्लेषण महत्वपूर्ण पहलू है. यह वर्तमान अध्ययन क्रोस प्रैमिंग के ज़रिए ई. टेट्राडक्टैलम की आनुवंशिक संरचना को स्पष्ट करके मैक्रोसाटलाईट प्रैमर को विकसित करने हेतु आयोजित की गयी. संपदा प्रजाति पसिफिक तारली पोलिडक्टैलस सेक्सफिलिस से कुल 13 पोलिमोर्फिक मैक्रोसाटलाईट मार्कर विकसित की गयीं. जेनेटिक तत्व की निरीक्षित औसत एवं कुल संख्या क्रमशः 11.962 और 6.927 थी. निरीक्षित विषमयुग्मजता (heterozygosity) एवं अपेक्षित विषमयुग्मजता (heterozygosity) का औसत मूल्य क्रमशः 0.784  और 0.798 थी. ये नई मैक्रो साटलाइट मार्कर ई. टेट्राडक्टैलम की आनुवंशिक असमानता पर अध्ययन के साथ साथ जीव संख्या के विकासात्मक संबंध को स्पष्ट करने के लिए एक सशक्त माध्यम के रूप में उपयोग किया जा सकता है.

टेलियोस्ट (teleost), एट्रोप्लस सूराटेन्सिस में प्रेरित एफ्लाटोक्सिकोसिस(aflatoxicosis) से संबंधित जिगर की चोट

टेलियोस्ट (teleost), एट्रोप्लस सूराटेन्सिस में प्रेरित एफ्लाटोक्सिकोसिस(aflatoxicosis) से संबंधित जिगर की चोट  

एफ्लाटोक्सिकोसिस एक ऐसी बीमारी है जो आसपेरगिल्लस वंश के कवक द्वारा उत्पादित मैकोटोक्सिन जैसी हानिकारक ग्रुपों के एफ्लाटोक्सिकोसिस के अंतर्ग्रहण एवं अंतः श्वसन से उत्पन्न होता है. यह कवक खाद्य एवं जलजीव पालन में उपयोग की जाने वाली खाद्य सामग्रियों में बढ़ता है एवं इसकी बढ़ती और टोक्सिन उत्पादन में उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु सहायक सिद्ध होता है. आठ हफ्तों तक एफ्लाटोक्सिन B1(AFB1) से युक्त खाद्य 0.4 मि. ग्रा. AFB-1 कि. ग्रा.- 1 की दर पर उष्णकटिबंधीय नदीमुख टेलियोस्ट (teleost), एट्रोप्लस सूराटेन्सिस (ब्लोच, 1790) को दिलाकर उसकी संवेदनशीलता को निर्धारित करने के लिए यह अध्ययन किया गया है. प्रयोगात्मक खाद्य दिलाने के बाद एफ्लाटोक्सिन दी गयी मछलियों का जिगर काले धब्बे से युक्त कमज़ोर पाया गया. हिस्टोपातोलजिकल एवं इलेक्ट्रोन माइक्रोस्कोप (electron microscope) अध्ययन के द्वारा जिगर की कमजोरी से हेपाटोमा (hepatoma) की शुरुआत होने की सूचना मिली. कई हिस्टोपातोलजिकल (histopathological) परिवर्तनों में सिकुड़ा हुआ पैकनोटिक नाभिक, (shrunken pyknotic nuclei) बेसोफिलिक फोकी (basophilic foci) का गठन, विभिन्न आकारों में पॉलीहेड्रल हेपेटोसाइट्स (polyhedral hepatocytes), कई नाभिक और माइटोटिक नाभिक (mitotic nuclei) पाए गए. नाभिक में इलेक्ट्रॉन घने समावेशन की उपस्थिति, माइक्रोविली (microvilli) की संरचना का नाश, एंडोप्लास्मिक रेटिकुलम (endoplasmic reticulum) का विखंडन, डेस्मोसोम(desmosomes) का पृथक्करण, प्लाज्मा-लेम्मा (plasma-lemma ) और परमाणु झिल्ली की निरंतरता का नाश जैसे अति संरचनात्मक परिवर्तन भी स्पष्ट थे। वर्तमान अध्ययन में, एफ्लाटोक्सिकोसिस (aflatoxicosis) के लिए प्रजातियों की संवेदनशीलता को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया गया है और हेपाटोमा के परिणामी प्रेरणा से हेपेटोकार्सिनोमा (hepatocarcinomas) पर अध्ययन करने हेतु इस प्रजाति को पशु नमूना के रूप में उपयोग करने की संभावना का संकेत दिया गया है.

मनपाड तट पर छोटी पंखवाली पैलट तिमी ग्लोबिसेफाला माक्रोरिन्कस का भारी धंसन एवं बाइसोनार डिसफंगशन (bisonar dysfunction)

मनपाड तट पर छोटी पंखवाली पैलट तिमी ग्लोबिसेफाला माक्रोरिन्कस का भारी धंसन एवं बाइसोनार डिसफंगशन (bisonar dysfunction)

मनपाड तट पर दिनांक 11 से 15 जनवरी, 2016 तक 81 छोटी पंखवाली पैलट तिमी (एस एफ पी डब्ल्यु) ग्लोबिसेफाला माक्रोरिन्कस का भारी धंसन रिपोर्ट की गयी. 43 वर्ष पहले, इसी तट पर इसी महीने में 147 एस एफ पी डब्ल्यु धंसन की रिपोर्ट की गयी थी. धंसित प्रजातियों का आकृतिपरक मापन किया गया. शव परीक्षा एवं अनुवर्ती खोज करने पर इन प्राणिजातों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की स्पष्ट सूचना नहीं देखी गयी. हाल ही में हुए तिमियों के भारी धंसन का कारण बाइसोनार डिसफंगशन (bisonar dysfunction) हो सकता है.


तट संपाश मात्स्यिकी के जैविक अर्थशास्त्र पर अवलोकन : धनुषकोडी द्वीप से मामले का अध्ययन

तट संपाश मात्स्यिकी के जैविक अर्थशास्त्र पर अवलोकन : धनुषकोडी द्वीप से मामले का अध्ययन    

तमिल नाडु के धनुषकोडी में तट संपाश का उपयोग वर्षों पहले से लेकर किया जा रहा है और वर्तमान लेख में मत्स्यन, मात्स्यिकी एवं मछुआरों में इसके दृष्टिकोण पर अध्ययन किया गया है. तट संपाश का प्रयोग समुद्री घास तलों, जो वाणिज्यिक प्रमुख मछलियों का प्रजनन और खिलाने का स्थान है, पर किया जाता है और पकड़ में ज़्यादातर किशोर मछलियाँ देखी गयीं. जनन – ग्रंथि की जांच करने पर ज़्यादातर मछलियां अपरिपक्व एवं अंडाशय विकास पूर्ण होने की अवस्था में पायी गयीं. वर्ष 2015-16 के दौरान छह प्रमुख मछली प्रजातियों के किशोरों का आर्थिक मूल्यांकन करने पर धनुषकोडी के तट सम्पाश द्वारा 44.64 करोड़ रुपए का आर्थिक नष्ट रिपोर्ट की गयी. प्रतिदिन अवतरण की गयी मछलियों का कुल राजस्व रु 300 से रु. 15,000 तक है और इसका औसत एक यूनिट में प्रति दिन 5000 रु था. इस कार्य में कुल 22 से 24 तक मछुआरे शामिल हैं, तदनुसार लाभ का वितरण भी किया जाना है.


नारंगी चित्ती ग्रूपर एपिनिफेलस कोइओइडस में कोपिपोड परजीवी लिपियोफ्थीरस कबटइ का ग्रसन

नारंगी चित्ती ग्रूपर एपिनिफेलस कोइओइडस में कोपिपोड परजीवी लिपियोफ्थीरस कबटइ का ग्रसन

नारंगी चित्ती ग्रूपर एपिनिफेलस कोइओइडस (हामिल्टन, 1822) पर परजीवी संक्रमण एवं प्रग्रहण अवस्था में इसके नियंत्रण उपाय पर अध्ययन किया गया. प्रग्रहण अवस्था में 8 हफ्तों तक पालन की गयी प्राकृतिक स्थानों से संग्रहित ग्रूपरों में निष्क्रियता देखी गयी. प्रभावित मछलियों में से कलिजिड परजीवी, लिपियोफ्थीरस कबटइ (हो एवं डोजिरी, 1977) पहचाना गया. यह परजीवी प्राकृतिक स्थानों की मछलियों में प्रचलित थी, मगर कम मात्रा (11%) में पायी गयी. प्रग्रहण अवस्था में पालन की गयी मछलियों में एल. कबटइ की तीव्रता 92.85+10.71 थी जब की प्राकृतिक रूप से पकड़ी मछलियों में  3.54+1.61 थी. पालन की गयी संक्रमित मछलियों को A से E तक पांच उपचार ग्रुपों में बांटा गया. ग्रुप A की मछलियों को 5 मिनट तक डिप ट्रीटमेंट (dip treatment) दिया गया जब कि ग्रुप B,C,D एवं E को 30 मिनट तक  क्रमशः 50,100,150 एवं 200 मि. ग्रा I- 1 फोर्मलिन में बाथ ट्रीटमेंट (Bath treatment) दिया गया जिसके बाद 5 मिनट डिप ट्रीटमेंट (dip treatment) दिया गया. ग्रुप E की मछलियां पूर्णतः ग्रसन से मुक्त थीं और दो महीने के बाद भी पुनः ग्रसन नहीं देखा गया. प्राकृतिक रूप से एवं पालन की गयी नारंगी चित्ती ग्रुपर में एल. कबटइ ग्रसन की पुष्टि करने का यह पहला अध्ययन है और प्रग्रहण के समय इस ग्रसन को रोकने के लिए 200 मि. ग्रा. 1-1 की दर पर फोर्मलिन ट्रीटमेंट प्रभावकारी है.


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