भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद
केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान

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भारतीय समुद्र से पीले किनारेवाली आयरटेल ग्रूपर में फिलोमेट्रा के ग्रसन की पहली रिपोर्ट

दो वर्ष की अवधि से अधिक पीले किनारेवाली आयरटेल ग्रूपर, वारियोला लौटी की जनन – ग्रंथि में नेमाटोड ग्रसन का फैलाव निर्धारित करने के लिए अध्ययन किए गए. परिणामों से यह पता चला कि मानसून के बाद के महीनों में नेमाटोडों की उपस्थिति दिखायी. जनन – ग्रंथि अपक्षय से भी नेमाटोड का विलगन एवं पहचान पायी गयी. काँटा डोर मात्स्यिकी में योगदान देनेवाली पीले किनारेवाली आयरटेल प्रजाति फिलोमेट्रा वंश के नेमाटोडों से ग्रसित दिखायी जा रही है. चूंकि प्रत्येक मछली के लिए नेमाटोड विशिष्ट है, इसकी पहचान के लिए आगे का अध्ययन आवश्यक है.

केरल तट पर मड बैंक एवं मात्स्यिकी – कल्पना एवं वास्तविकता

मड बैंक, दक्षिण पश्चिम मानसून मौसम के दौरान भारत के दक्षिण पश्चिम तट पर होने वाला अनोखा तटीय महासमुद्री घटना है, जो इस क्षेत्र की मात्स्यिकी के समान है. यहां, वर्ष 2014 के दौरान आलपुषा के मड़ बैंक से संग्रहित उच्च कालिक विभेदन जल स्तंभ आंकड़े के द्वारा मात्स्यिकी आंकडों का संयोजन करते हुए इस लोकप्रिय धारणा की वैधता की जांच की जाती है कि मड बैंक समृद्ध मात्स्यिकी का सीधा समर्थन करता है. हमारे अध्ययन से यह व्यक्त होता है कि इस तट पर दक्षिण पश्चिम मानसून मौसम के दौरान होने वाले उत्स्रवण से ऑक्सीजन रहित उप सतह पानी को ऊपरी जल स्तंभ की ओर ले जाता है. ऑक्सीजन रहित पानी से बचकर मछली ऊपरी सतह में एकत्रित होती है जिससे आसानी से पहचानकर पकडी जा सकती है. यह प्रक्रिया पूरे तट पर होती है और यह मड बैंक तक सीमित नहीं है. मड बैंक शांत क्षेत्र होने के कारण, मोटर रहित देशीय जलयान का उपयोग करने वाले परंपरागत मछुआरे इस क्षेत्र में दक्षिण पश्चिम मानसून के दौरान ही यहां मत्स्यन कर सकते हैं. मोटोरीकृत एवं यंत्रीकृत मत्स्यन के प्रारम्भ से, मड बैंक और मात्स्यिकी के बीच की कड़ी कम महत्वपूर्ण है हालांकि मड बैंक अभी भी प्रमुख मछली अवतरण केंद्र बने रहने हेतु चालू हैं.

पूर्व हिन्द महासागर के बंगाल उपसागर के आल्बुनेइड केकडा वितरण में लुप्त कड़ी का भरना

आल्बुनेइड केकडे विशेष एवं रेत में डुबे हुए जीव हैं. पर्याप्त विविधता के बावजूद, मत्स्यन गिअर से बचने की क्षमता के फलस्वरूप ये “संग्रहणाधीन” और असंतुलित वितरण का रिकोर्ड दर्शाता है. वर्तमान अध्ययन पूर्व हिन्द सागर के बंगाल उपसागर से आल्बुनिया ओक्युलेटा बोयको, 2002 का प्रथम वितरण रिकोर्ड प्रलेखित करता है. आल्बुनिया तर्स्टोनी हेंडेरसन, 1893 भी पहली बार दक्षिण पश्चिम बंगाल उपसागर के मन्नार की खाड़ी से रिकोर्ड किया गया. आगे यह अध्ययन विविध क्षेत्रों से प्राप्त नमूनों और पूर्व रिकोर्ड़ों से मुख्यतः पृष्ठवर्म की नालियों में आकृतिपरक परिवर्तन दिखाता है. प्रजातियों का विभेद जो स्पष्ट किया गया है, जानने के लिए आकृतिपरक विशेषताएं उपयोगी पायी गयीं.

आनायक द्वरा छोडे गए अपरीक्षित ब्राकैरुन्स, चारिब्डिस होपलाइट्स एवं चारिब्डिस स्मिती पर अन्वेषण

पारितंत्र पर आधारित मात्स्यिकी प्रबंधन (ई बी एफ एम) के लिए डेटा बेस को सशक्त बनाने हेतु गैर वाणिज्यिक संपदाओं पर डेटा का अंतर हल करने के प्रयास के रूप में जी आइ एस – आधारित संपदा मापन के प्रभाव की जांच की गयी. इसका परिणाम दक्षिण पश्चिम अरेब सागर (एस ई ए एस) के नितलस्थ पारितंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रभावशाली प्रजातियों में से एक का उदाहरण देकर व्यक्त किया गया है. 2803 टन आकलित चारिब्डिस होपलैट्स, जो तट में कम जानने वाली प्रजाती है और साल भर में मांगलूर मात्स्यिकी पोताश्रय से आनायकों द्वारा पकड़कर छोडी जाती है. वितरण एवं प्रचुरता पर जी आइ एस सहायक अध्ययन ने आकलित किया कि किसी भी समय क्षेत्र में पायी जाने वाली प्रजातियों की औसत जैव मात्रा 322.7 टन है. यह अध्ययन इस तथ्य को व्यक्त करता है कि अनेक गैर वाणिज्यिक जीवजात गैर पकड़ने योग्य कारक के रूप में टिकाऊ उत्पादकता में सहायक होते हैं. अतः उनकी भूमिका की पहचान एवं जैव मात्रा का परिमाणन ई बी एफ एम के प्रभावी कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण गठन करते हैं.

कालिस्पोंजिया सुबरमिगेरा में प्रत्येक जीवाणु का सहजीवन एवं इसकी बाह्यकोशिकीय सक्रियता

कालिस्पंजिया सुबरमिगेरा में पालन योग्य जीवाणुओं की प्रतिसूक्ष्मजीवी क्षमता को निर्धारित किया गया. भारतीय महासागर से 10 से 15 मी. की दूरी पर दक्षिण पूर्व तट के किनारे से उप पकड़ द्वारा सर्वाधिक स्पंज सी. सुबरमिगेरा को आकलित किया गया. उपनिवेशों की पुनः प्राप्ति के लिए तापमान एवं पी एच को 300 C एवं 8.5 में मानकीकृत किया गया. एक वर्ष के लिए स्पंज के पुनः प्राप्ति योग्य सहभागियों को अलग रखा गया एवं 16 परीक्षण रोगजनकों के विरुद्ध उसके प्रतिजीवाणुक सक्रियता का अध्ययन किया गया है. 56 वियोजकों में से व्यापक जीवाणुक स्पेक्ट्रम सहित 6 वियोजकों को विविध पालन योग्य अवस्थाओं एवं जैव रासायनिक विशेषताओं पर अनुकूलित किया गया. पृथक्कीकरण के दौरान एम आर एस ऐगार में दो लाक्टोबसिल्लस वियोजक एवं हालोफिल्लिक ऐगार में अत्यधिक लवण सहिष्णु वियोजक पाया गया. पी एच रेंज 4.0-13 की दर पर वियोजकों ने अतिजीवीतता दिखायी जब कि एस. रुबिड़े सी एस पी. एवं बी. अमैलोलिक्युफेसियन सी एस जी तापमान रेंज 25-45 0C पर प्रवर्धित हुई. सेराट्टिया रूबिडेया सी एस पी एवं बसिल्लस अमैलोलिक्युफेशियन ने लंबी ऊष्मायन अवस्था के दौरान अत्यंत जीवाणुपरक सक्रियता दिखायी जब कि कवकरोधी सक्रियता काफी कम दिखायी थी. कालिस्पोनजिया डिफ्युसा में विशेष पालन योग्य जीवाणु के सहजीवन को पृथक किया गया. प्रजातियों के स्तर पर दो जनन क्षम उपभेदों को विशेषित किया गया. स्पंज से जुड़े जीवाणु में प्रतिजीवाणुक सिद्धांत को सुलझाने के लिए काफी अध्ययन की ज़रुरत है.

रीफ नीडिलफिश (सूची मीन) स्ट्रोंगिलूरा इनसिसा का भौगोलिक वितरण परास का विस्तार

वर्तमान अध्ययन वर्ष 2016-17 के दौरान भारत के टूटिकोरिन तट एवं आंडमान द्वीप से आकलित पांच नमूनों के आधार पर स्ट्रोंगिलूरा इनसिसा (बेलोनिड़े) की नई रिकोर्ड़ो से संबंधित है. नमूनों को पृष्ठ पख एवं गुद पख के नीचे शल्कों का अभाव,19-20 पृष्ठ पख रे, 21-23 गुद पख रे,102-113 पूर्व पृष्ठ शल्क, 4-5 गुद पख के ऊपर पृष्ठ पख की उत्पत्ति, ओपेरकिल एवं पूर्व ओपेरकिल के बीच गाल पर स्पष्ट लंबी निशान, जनन – ग्रंथि की दो पालियां, के द्वारा पहचाना गया. पूर्व पृष्ठ शल्कों की संख्या (एस. इनसिसा में 100-125 बनाम एस. लैयुरा में 130-180), गुद पख के ऊपर पृष्ठ पख की उत्पत्ति (एस. इनसिसा में 4-6 बनाम एस. लैयुरा में 7-10), जनन – ग्रंथि पालियों की संख्या (एस. इनसिसा में 2 बनाम एस. लैयुरा में 1) एवं रंग की विशेषताओं (एस. इनसिसा में ओपेरकिल एवं पूर्व ओपेरकिल के बीच गाल पर स्पष्ट लंबी निशान बनाम एस. लैयुरा में ओपेरकिल एवं पूर्व ओपेरकिल के बीच गाल पर एवं शरीर के अग्र भाग में काली पट्टी) के आधार पर स्ट्रोंगिलूरा इनसिसा को इसकी सबसे समान समजाति एस. लैयुरा से पहचाना जा सकता है. वर्तमान अध्ययन स्ट्रोंगिलूरा प्रजातियों की अद्यतन व्याख्या सहित भारत के पूर्व तट एवं आंडमान एवं निकोबार द्वीपों से एस. इनसिसा की प्रथम प्रलेखित रिकोर्ड प्रदान करता है. आगे, यह  भारत के पूर्व तट और आंडमान एवं निकोबार द्वीपों के इक्तियोफोनल जैवविविधता के लिए एक जोड़ है.


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